अक्सर ऐसा होता है,
मन, मन ही मन में रोता है।
क्यों जो दिखता वो ना होता ?
और जो होता कभी ना दिखता,
भ्रमजाल है बिखरा दुनिया में,
पर कौन इसे समझता है,
मन, मन-ही-मन में रोता है।
कुछ खोता है, कुछ पाता है,
सब पाकर भी पछताता है,
कभी बैठ ख़ुशी से गाता है,
और मन का चमन सजाता है,
पर
मन-ही-मन में रोता है।
मन ही मन की उलझन है,
उलझन ही मन की फितरत है,
मन को सुलझाना चाहा पर ,
ये हर पल और उलझता है,
मन, मन ही मन में रोता है।
रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️