चलो बहन सब काज छोड़ दो,
काम-धाम, आराम छोड़ दो।
समय निकालो, बूथ पे जाओ,
वोट करो और फर्ज निभाओ।
💁🏻 हा.. हा.. हा..
मै ना छोडूँ काज जरूरी,
काम-धाम, आराम जरूरी।
नही कभी मैं बूथ पे जाऊँ,
नाही किसी को चुनकर लाऊँ।
मै अपनी दुनिया में रहती,
मौज उड़ाती, ऐश हूँ करती।
देश- समाज से मुझे क्या लेना,
मुझे किसी को वोट न देना।
कोई जीते, कोई हारे,
भला करे या सबको मारे।
मैं अपने घर में रहती हूँ,
न्यूज़ लगा देखा करती हूँ।
समय- समय पर,
जोश में भरकर,
खरी-खोटी कहा करती हूँ।
सरकारें कुछ काम न करतीं,
लूट- पाट कर जेबें भरतीं।
हम तो कोसेंगे जी भरकर,
आए चाहें कोई जीतकर।
🧏 सुनो बहन!
सुनो बहन यह बात गलत है,
समझ
तुम्हारी, सोच गलत है।
घर बैठे तुम कोसा करती,
अपना रोना, रोया करती।
नहीं किया मतदान अगर तो
सही-गलत की बात क्या करती।
लोकतंत्र की गरिमा को,
तुम कैसे समझ न पाती हो।
घर बैठे बातें करती हो,
व्यर्थ में वोट गँवाती हो।
देश- समाज से पृथक नहीं,
तुम खुद भी इसका हिस्सा हो।
सबकी नैया डुबा रही हो,
बरबादी का किस्सा हो।
मिला हमें अधिकार चलो
हम अपना नेता चुनते हैं।
नव- भारत निर्माण करें
और स्वप्न मनोहर बुनते हैं।
जाँच - परखकर,
सोच - समझकर,
काबिल नेता लाएँगे,
जो होगा हितकारी मानव,
उसी को डोर थमाएँगे।
💁🏻️समझ गई मैं बात तुम्हारी,
मेरी गई थी बुद्धी मारी।
अब ना कुछ नुकसान करुँगी,
अभी चलो मतदान करुँगी।
रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️
Abhi chalo matdan karungi.
ReplyDelete