Sunday, 8 May 2022

माँ


हमने सभी रिश्तो में मिलावट देखा, 

हमने कच्चे रंग का सजावट देखा।

लेकिन सालों साल से देखा है मैंने माँ को,

ना चेहरे पर कभी उसके थकावट को देखा,

ना उसकी ममता में कभी मिलावट को देखा। 

माँ तेरे उस आँचल की मुझे छाँव चहिये,

माँ से रिश्ता कुछ ऐसा बनाया जाए,

की उसको अपने निगाहो में बिठाया जाए,

रहे हम दोनों का रिश्ता कुछ ऐसा,

अगर वो हो कभी उदास तो हमसे भी ना मुस्कुराया जाए।  

तेरा एक क़र्ज़ हम पर हमेशा सवार रहता है,

तेरा प्यार जो हम पर हमेशा उधार रहता है। 

मेरे लिए माँ तू है सबसे बढ़कर,

धन और दौलत नहीं कुछ तेरे से बढ़कर। 


रचना - (अभय तिवारी) ✍️

Sunday, 10 April 2022

शिक्षित भालू


गृष्मकाल का मौसम था और भीषण गर्मी छाई थी;
वन-उपवन अंगार बने थे, हर डाली मुरझाई थी।
नदी-नहर सब सूख गए थे, धरती भी पथराई थी;
जंगल की सुंदर शोभा को किसने नज़र लगाई थी?
वन्य-जीव सब व्याकुल होकर इधर-उधर थे भाग रहे,
बारिश की उम्मीद लगाए कई दिनो से जाग रहे।
चीकू बंदर पड़ा बिमार, उसकी हालत बड़ी खराब।
उल्टी, दस्त, बुखार हो गया; चीकू बड़ा बेहाल हो गया।
जंगल के राजा को जब ये हुआ कहीं से ज्ञात,
छोड़ जरूरी काज सभी वो लेने चले संज्ञान।
राजा चीकू की हालत पे बोले बात बड़ी गंभीर,
तनिक न खोना हिम्मत बेटा, चीकू तुम जंगल के वीर।
बिनी लोमड़ी दौड़ के आई, राजा को फिर याद दिलाई,
हम सबने है खबर ये पाई, भालू करते बड़ी पढ़ाई।
बोली शहर से भालू चाचा जंगल में घर आए हैं,
शिक्षा, ज्ञान, विद्या, बुद्धि का बड़ा खजाना लाए हैं।
राजन बोले,  बड़े पते की बिनी तुम्हारी बात,
भालू ही अब ठीक करेंगे बिगड़े हुए हालात।
भालू को बुलवाया जाए, सारा हाल बताया जाए।
भालू की अद्भुत प्रतिभा का, मिलकर लाभ उठाया जाए।
आँख पे चश्मा, गले मे टाई, पहन के आए भालू भाई।
हाथ जोड़ और शीष झुकाकर, सबके मन पर छाप बनाई।
भालू बोले मैं जांगल का, जंगल मेरी शान है,
वतन-परस्ती खून मे मेरे, इसपर सब कुर्बान है।
शहर गया मै शिक्षा लेने, शिक्षित होकर लौटा हूँ,
निज-अनुबंधित परिजनो का सेवक बनकर लौटा हूँ।
भालू ने चीकू को देखा, प्यार से सिर सहलाया,
भालू के इस करुण-भाव से चीकू फिर मुस्काया।
थर्मामीटर का प्रयोग कर जाँचा चीकू का बुखार,
अरे! ये क्या? ये तो था 1०० डिग्री से पार।
चीकू बोला भालू चाचा पेट मे गुड़गुड़ होता है,
अंग-अंग मे दर्द भरा है, मेरा मन बस रोता है।
स्टेथोस्कोप से धड़कन जाँची, नब्ज़ देखकर बतलाया,
तपन लगी है तुमको चीकू और कहीं कुछ गलत है खाया।
खाने को तो फल-पत्ते ही मजे से खाया करता हूँ,
इस डाली से उस डाली पर उछल-कूद भी करता हूँ।
तपन बढ़ी थी, प्यास लगी थी, सभी जलाशय सूख गए।
पानी की तलाश मे चाचा हम जंगल से दूर गए।
जाकर देखा निकट शहर के, एक नहर जिसमे था पानी;
पानी से तो प्यास बुझी पर लगा कि मैनें की नादानी।
पानी नहीं था पानी जैसा, रंग था उसका पीला- काला।
क्या वो कोई शापित जल था? या पिसाच ने डेरा डाला।
घबराया मै वापस भागा, प्यास तो मेरी शांत हो गई,
लेकिन उसी मन्हूस घड़ी में तबियत मेरी अशांत हो गई।
यही वजह है जिसके कारण अपना स्वास्थ्य गवाए हो,
शापित नहीं, प्रदूषित जल था, जिसको पीकर आए हो।
कोई भूत-पिसाच नहीं था, चीकू तू तो भोला है।
हाई-टेक के चक्कर में मानव नें विष घोला है।
मानव ने ! ये कैसे हो सकता है?
जो जीवों में सर्वश्रेष्ट है, वो भी अनिष्ट कर सकता है?
सुना है मानव पृथ्वी ग्रह पे सबसे काबिल प्राणी है,
समझ-बूझ में सबसे आगे, बुद्धिमान है, ज्ञानी है।
मानवता और पशुता में क्या भेद है? चाचा बतलाओ।
वैज्ञानिक साक्षरता का उद्देश्य हमें भी समझाओं
जरा नहीं संदेह कि मानव एक अलौकिक जीव है,
पर इसके विध्वंसक करतूतों से हिली धरा की नीव है।
ये साक्षर है, वैज्ञानिक है, ये पढ़ता है, ये रटता है,
ये बड़ी तैयारी करता है और नम्बर अच्छे लाता है।
लिख देता उत्तर- पत्रक पे, साक्षरता साबित कर देता,
शिक्षा के मुल्यों को धारण किए बिना ही डिग्री लेता।
तकनीकी का कर प्रयोग, यह वर्तमान को सुलभ बनाता;
करता नही भविष्य की चिंता आज में ही बस जीता-खाता।
केवल सींग और पूँछ नही पर मानव में भी पशुता है,
विस्फोटक का कर प्रयोग ये वायु में भी विष घोलता 
है
लेकिन बड़ा ही ढोंगी मानव पर्यावरण दिवस मनाता है,
खुद ही पशु प्रेमी बनता, पशु- पक्षी भी पालता है।
गूँज उठा सारा जंगल कि पालो नहीं हमे पलने दो;
हम भी इसी धरा के वासी, सहज हमें भी रहने दो
पालो नहीं, हमे पलने दो।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Sunday, 27 March 2022

आघात

 

एक शोर हुआ, ऐसा गूँजा कि  

अन्तःकरण अशांत हुआ।

तूफ़ान उठा ऐसा जोरों का

कण-कण पल में खिन्न हुआ।

 

कुछ टूट गया, कुछ फूट गया,

कुछ रौंद गया, कुछ नष्ट हुआ।

एक आग लगी ऐसी कि

हाहाकार मचासब राख हुआ।

 

वह राख उड़ी उजले मन पर,

धुंधला सा सारा दृश्य हुआ।

फिर कुछ ना बचा चोटिल मन में

बस आह बची और दर्द हुआ।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Tuesday, 1 March 2022

भोले की महिमा


हाथ में जिसके डमरू बाजे,   
गले मे लिपटे नाग, 
लीला जिसकी अपरम्पार
वो हैं भोले नाथ

एक फूल, एक पत्र बेल का, 
एक लोटा जल की धार, 
हे भोलेनाथ ! हे महादेव ! 
कर दे भक्तों का कल्याण

भोले की महिमा है अपरंपार,
सभी भक्तों का करते कल्याण, 
आओ शीश नवाये भोले के चरणों में, 
मिल कर हम बांटे भोले का प्यार अपनों मे 

चरण में रखना, शरण में रखना, 
हरदम तेरी लगन में रखना, 
सुख का उजियारा हों या दुःख का अँधेरा, 
जो भी हो भोले, मगन में ही रखना

माला ये साँसों की, सिमरन के मोती, 
मेरा मन ना भटके, शरण में रखना, 
पलकें गिराऊ जो भोले, बस तेरे ही हो दर्शन, 
हर पल मुझे बस इसी तड़पन में रखना।


रचना - (अभय तिवारी) ✍️


Friday, 25 February 2022

जागरूक मतदाता

            

    चलो बहन सब काज छोड़ दो,

    काम-धाम, आराम छोड़ दो।

    समय निकालो, बूथ पे जाओ,

    वोट करो और फर्ज निभाओ।

 

      💁🏻‍  हा.. हा.. हा..

       मै ना छोडूँ काज जरूरी,

       काम-धाम, आराम जरूरी।

       नही कभी मैं बूथ पे जाऊँ,

       नाही किसी को चुनकर लाऊँ।

 

       मै अपनी दुनिया में रहती,

       मौज उड़ाती, ऐश हूँ करती।

       देश- समाज से मुझे क्या लेना,

       मुझे किसी को वोट न देना।

 

       कोई जीते, कोई हारे,

       भला करे या सबको मारे।

       मैं अपने घर में रहती हूँ,

       न्यूज़ लगा देखा करती हूँ।

        समय- समय पर,

        जोश में भरकर,

        खरी-खोटी कहा करती हूँ।

 

        सरकारें कुछ काम न करतीं,

        लूट- पाट कर जेबें भरतीं।

        हम तो कोसेंगे जी भरकर,

        आए चाहें कोई जीतकर।

 

       🧏‍ सुनो बहन!

        सुनो बहन यह बात गलत है,

        समझ तुम्हारी, सोच गलत है।

        घर बैठे तुम कोसा करती,

        अपना रोना, रोया करती।

        नहीं किया मतदान अगर तो

       सही-गलत की बात क्या करती।

 

       लोकतंत्र की गरिमा को,

       तुम कैसे समझ न पाती हो।

       घर बैठे बातें करती हो,

       व्यर्थ में वोट गँवाती हो।

       देश- समाज से पृथक नहीं,

       तुम खुद भी इसका हिस्सा हो।

       सबकी नैया डुबा रही हो,

       बरबादी का किस्सा हो।

 

       मिला हमें अधिकार चलो

       हम अपना नेता चुनते हैं।

       नव- भारत निर्माण करें

       और स्वप्न मनोहर बुनते हैं।

 

       जाँच - परखकर, 

       सोच - समझकर,

       काबिल नेता लाएँगे,

       जो होगा हितकारी मानव,

       उसी को डोर थमाएँगे।

 

      💁🏻‍️समझ गई मैं बात तुम्हारी,

       मेरी गई थी बुद्धी मारी।

       अब ना कुछ नुकसान करुँगी,

       अभी चलो मतदान करुँगी।


        रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Wednesday, 9 February 2022

विदाई

 

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ  छोड़कर,

मोह-माया, प्यार-ममता,

सारे बंधन तोड़कर।

 

ओस की बूंदो सी निर्मल,

भावनाये प्रियजनों की,

माँ की ममता स्नेह सबका,

हठखेलिया भाई-बहन की,

सब चलेंगे संग तेरे,

तेरा दामन थामकर,

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ छोड़कर।

 

माँग ले रब से दुवाएँ,

पीहर तेरा अमर हो,

तू रहे खुशहाल हरदम,

ससुराल तेरा स्वर्ग हो,

मन तेरा मंदिर बने,

मंदिर में तेरे राम हो,

हर जनम में सात जन्मो का,

उन्ही का साथ हो।

 

स्वप्न भर ले नयन में तू,

सारे गम को भूलकर,

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ छोड़कर।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Thursday, 13 January 2022

उलझन

 

अक्सर ऐसा होता है

मन, मन ही मन में रोता  है।

 

क्यों जो दिखता वो ना होता ?

और जो होता कभी ना दिखता,

भ्रमजाल है बिखरा दुनिया में,

पर कौन इसे समझता है,

मन, मन-ही-मन  में रोता  है।


कुछ खोता है, कुछ पाता है,

सब पाकर भी पछताता है,

कभी बैठ ख़ुशी  से गाता है,

और मन का चमन सजाता है,  

पर मन-ही-मन  में रोता  है।

 

मन ही मन की उलझन है,

उलझन ही मन की फितरत है,

मन को सुलझाना चाहा पर ,

ये हर पल और उलझता है,

मन, मन ही मन  में रोता  है।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

 

 

 

 

माँ

हमने सभी रिश्तो में मिलावट देखा,  हमने कच्चे रंग का सजावट देखा। लेकिन सालों साल से देखा है मैंने माँ को, ना चेहरे पर कभी उसके थकावट को देखा,...