Sunday, 27 March 2022

आघात

 

एक शोर हुआ, ऐसा गूँजा कि  

अन्तःकरण अशांत हुआ।

तूफ़ान उठा ऐसा जोरों का

कण-कण पल में खिन्न हुआ।

 

कुछ टूट गया, कुछ फूट गया,

कुछ रौंद गया, कुछ नष्ट हुआ।

एक आग लगी ऐसी कि

हाहाकार मचासब राख हुआ।

 

वह राख उड़ी उजले मन पर,

धुंधला सा सारा दृश्य हुआ।

फिर कुछ ना बचा चोटिल मन में

बस आह बची और दर्द हुआ।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

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