Friday, 25 February 2022

जागरूक मतदाता

            

    चलो बहन सब काज छोड़ दो,

    काम-धाम, आराम छोड़ दो।

    समय निकालो, बूथ पे जाओ,

    वोट करो और फर्ज निभाओ।

 

      💁🏻‍  हा.. हा.. हा..

       मै ना छोडूँ काज जरूरी,

       काम-धाम, आराम जरूरी।

       नही कभी मैं बूथ पे जाऊँ,

       नाही किसी को चुनकर लाऊँ।

 

       मै अपनी दुनिया में रहती,

       मौज उड़ाती, ऐश हूँ करती।

       देश- समाज से मुझे क्या लेना,

       मुझे किसी को वोट न देना।

 

       कोई जीते, कोई हारे,

       भला करे या सबको मारे।

       मैं अपने घर में रहती हूँ,

       न्यूज़ लगा देखा करती हूँ।

        समय- समय पर,

        जोश में भरकर,

        खरी-खोटी कहा करती हूँ।

 

        सरकारें कुछ काम न करतीं,

        लूट- पाट कर जेबें भरतीं।

        हम तो कोसेंगे जी भरकर,

        आए चाहें कोई जीतकर।

 

       🧏‍ सुनो बहन!

        सुनो बहन यह बात गलत है,

        समझ तुम्हारी, सोच गलत है।

        घर बैठे तुम कोसा करती,

        अपना रोना, रोया करती।

        नहीं किया मतदान अगर तो

       सही-गलत की बात क्या करती।

 

       लोकतंत्र की गरिमा को,

       तुम कैसे समझ न पाती हो।

       घर बैठे बातें करती हो,

       व्यर्थ में वोट गँवाती हो।

       देश- समाज से पृथक नहीं,

       तुम खुद भी इसका हिस्सा हो।

       सबकी नैया डुबा रही हो,

       बरबादी का किस्सा हो।

 

       मिला हमें अधिकार चलो

       हम अपना नेता चुनते हैं।

       नव- भारत निर्माण करें

       और स्वप्न मनोहर बुनते हैं।

 

       जाँच - परखकर, 

       सोच - समझकर,

       काबिल नेता लाएँगे,

       जो होगा हितकारी मानव,

       उसी को डोर थमाएँगे।

 

      💁🏻‍️समझ गई मैं बात तुम्हारी,

       मेरी गई थी बुद्धी मारी।

       अब ना कुछ नुकसान करुँगी,

       अभी चलो मतदान करुँगी।


        रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Wednesday, 9 February 2022

विदाई

 

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ  छोड़कर,

मोह-माया, प्यार-ममता,

सारे बंधन तोड़कर।

 

ओस की बूंदो सी निर्मल,

भावनाये प्रियजनों की,

माँ की ममता स्नेह सबका,

हठखेलिया भाई-बहन की,

सब चलेंगे संग तेरे,

तेरा दामन थामकर,

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ छोड़कर।

 

माँग ले रब से दुवाएँ,

पीहर तेरा अमर हो,

तू रहे खुशहाल हरदम,

ससुराल तेरा स्वर्ग हो,

मन तेरा मंदिर बने,

मंदिर में तेरे राम हो,

हर जनम में सात जन्मो का,

उन्ही का साथ हो।

 

स्वप्न भर ले नयन में तू,

सारे गम को भूलकर,

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ छोड़कर।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

माँ

हमने सभी रिश्तो में मिलावट देखा,  हमने कच्चे रंग का सजावट देखा। लेकिन सालों साल से देखा है मैंने माँ को, ना चेहरे पर कभी उसके थकावट को देखा,...