Sunday, 3 October 2021

मनोरम स्वप्न..

स्वप्न यही देखूं कि जग में, 
हर क्षण उत्सव होय।
सुखिया बने ये दुनिया सारी,
दुखिया रहे ना कोय।
बुद्धि, विद्या, तेज विवेक,
सबके मन में संचित हो,
धन और धान्य अपार सुखो से,
ना ही कोई वंचित हो।
ईश्वर की भक्ति हो मन में,
प्रेम रहे भरपूर,
राग द्वेष से चित्त सभी का,
रहे कोशों दूर।
स्मरण करे ईश्वर का तो,
मन उपवन सा खिल जाए,
वैष्णव जन बन सेवा-पथ पर,
फूलों जैसा बिछ जाए।
भक्ति करें ऐसी कि अपना 
जीवन सफल बना जाए।
कर्म करें ऐसा की मर के भी
अमरत्व को पा जाये।


रचना - (अभय तिवारी) ✍️

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