जिंदगी की वाटिका में,
कर्म और यह भाग्य ही तो,
खेलते हैं खेल हरदम।
है मनोबल तुझमे गर तो,
तू भी कुछ कर जाएगा,
कर्म से ही तो तू अपने,
आसमां को पायेगा,
किंतु तेरा भाग्य गर ना,
रास तुझको आयेगा,
तो ये तुझको खिंचकर,
वापस धरा पर लायेगा।
मनु नहीं मनुपुत्र है तू,
फिर उठेगा फिर चलेगा,
फिर गगन तक जाएगा,
तोड़ कर नभ से सितारे,
ले जमीं पर आयेगा,
इन सितारों की चमक से,
सज उठेगी फिर धरा,
स्वर्ग के सपनों से सुंदर,
स्वर्ग होगा फिर यहाँ।
रचना - (संगीता पाण्डेय) ✍️
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