Sunday, 10 October 2021

दिलासा


ये गम के जो बादल है कब तक रहेंगे,
कभी तो इन्हे भी मिटना पड़ेगा।
उगेगा सूरज जब मेरी किस्मत का,
ह्रदय में कही ना अँधेरा रहेगा।
ये सदियों से जो चक्र चलता रहा है, 
ये चलता रहेगा कभी ना रुकेगा। 
अभी इस घडी रात का है बसेरा, 
अगले ही छड़ दिन डालेगा डेरा।
दूरी तो है सिर्फ सोलह घडी की, 
फिर क्यों फिकर है मुझे जिंदगी की। 
ये गम और खुशी है दो पैर जिंदगी के,
इन्ही से जुड़े है हर छड़ जिंदगी के। 
जब गम बढे तो खुशी पीछे ठहरे, 
ख़ुशी जब बढे तो गम पे है पहरे। 
इसी क्रम से हमको भी जीना पड़ेगा, 
ये सब दर्द दुनिया का सहना पड़ेगा।
यही सोचकर मैंने खुद को संभाला, 
कभी दुख़ को भी दूर होना पड़ेगा। 
दुख इतना गहरा नहीं होता जिससे उभर ना पाये, 
आते हो अगर मोड़ जिंदगी में तो मुड़ जाए। 
मुश्किलें आती है तो बेशक आये, 
मगर आप अपना होश ना गवाए। 
देनी अगर दिल को सांत्वना, 
तो मेरी कविता दिलासा को अपनाये।


रचना - (संगीता पाण्डेय) ✍️

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