नदी-नहर सब सूख गए थे, धरती भी पथराई थी;
जंगल की सुंदर शोभा को किसने नज़र लगाई थी?
वन्य-जीव सब व्याकुल होकर इधर-उधर थे भाग रहे,
बारिश की उम्मीद लगाए कई दिनो से जाग रहे।
चीकू बंदर पड़ा बिमार, उसकी हालत बड़ी खराब।
उल्टी, दस्त, बुखार हो गया; चीकू बड़ा बेहाल हो गया।
जंगल के राजा को जब ये हुआ कहीं से ज्ञात,
छोड़ जरूरी काज सभी वो लेने चले संज्ञान।
राजा चीकू की हालत पे बोले बात बड़ी गंभीर,
तनिक न खोना हिम्मत बेटा, चीकू तुम जंगल के वीर।
बिनी लोमड़ी दौड़ के आई, राजा को फिर याद दिलाई,
हम सबने है खबर ये पाई, भालू करते बड़ी पढ़ाई।
बोली शहर से भालू चाचा जंगल में घर आए हैं,
शिक्षा, ज्ञान, विद्या, बुद्धि का बड़ा खजाना लाए हैं।
राजन बोले, बड़े पते की बिनी तुम्हारी बात,
भालू ही अब ठीक करेंगे बिगड़े हुए हालात।
भालू को बुलवाया जाए, सारा हाल बताया जाए।
भालू की अद्भुत प्रतिभा का, मिलकर लाभ उठाया जाए।
आँख पे चश्मा, गले मे टाई, पहन के आए भालू भाई।
हाथ जोड़ और शीष झुकाकर, सबके मन पर छाप बनाई।
भालू बोले मैं जांगल का, जंगल मेरी शान है,
वतन-परस्ती खून मे मेरे, इसपर सब कुर्बान है।
शहर गया मै शिक्षा लेने, शिक्षित होकर लौटा हूँ,
निज-अनुबंधित परिजनो का सेवक बनकर लौटा हूँ।
भालू ने चीकू को देखा, प्यार से सिर सहलाया,
भालू के इस करुण-भाव से चीकू फिर मुस्काया।
थर्मामीटर का प्रयोग कर जाँचा चीकू का बुखार,
अरे! ये क्या? ये तो था 1०० डिग्री से पार।
चीकू बोला भालू चाचा पेट मे गुड़गुड़ होता है,
अंग-अंग मे दर्द भरा है, मेरा मन बस रोता है।
स्टेथोस्कोप से धड़कन जाँची, नब्ज़ देखकर बतलाया,
तपन लगी है तुमको चीकू और कहीं कुछ गलत है खाया।
खाने को तो फल-पत्ते ही मजे से खाया करता हूँ,
इस डाली से उस डाली पर उछल-कूद भी करता हूँ।
तपन बढ़ी थी, प्यास लगी थी, सभी जलाशय सूख गए।
पानी की तलाश मे चाचा हम जंगल से दूर गए।
जाकर देखा निकट शहर के, एक नहर जिसमे था पानी;
पानी से तो प्यास बुझी पर लगा कि मैनें की नादानी।
पानी नहीं था पानी जैसा, रंग था उसका पीला- काला।
क्या वो कोई शापित जल था? या पिसाच ने डेरा डाला।
घबराया मै वापस भागा, प्यास तो मेरी शांत हो गई,
लेकिन उसी मन्हूस घड़ी में तबियत मेरी अशांत हो गई।
यही वजह है जिसके कारण अपना स्वास्थ्य गवाए हो,
शापित नहीं, प्रदूषित जल था, जिसको पीकर आए हो।
कोई भूत-पिसाच नहीं था, चीकू तू तो भोला है।
हाई-टेक के चक्कर में मानव नें विष घोला है।
मानव ने ! ये कैसे हो सकता है?
जो जीवों में सर्वश्रेष्ट है, वो भी अनिष्ट कर सकता है?
सुना है मानव पृथ्वी ग्रह पे सबसे काबिल प्राणी है,
समझ-बूझ में सबसे आगे, बुद्धिमान है, ज्ञानी है।
मानवता और पशुता में क्या भेद है? चाचा बतलाओ।
वैज्ञानिक साक्षरता का उद्देश्य हमें भी समझाओं
जरा नहीं संदेह कि मानव एक अलौकिक जीव है,
पर इसके विध्वंसक करतूतों से हिली धरा की नीव है।
ये साक्षर है, वैज्ञानिक है, ये पढ़ता है, ये रटता है,
ये बड़ी तैयारी करता है और नम्बर अच्छे लाता है।
लिख देता उत्तर- पत्रक पे, साक्षरता साबित कर देता,
शिक्षा के मुल्यों को धारण किए बिना ही डिग्री लेता।
तकनीकी का कर प्रयोग, यह वर्तमान को सुलभ बनाता;
करता नही भविष्य की चिंता आज में ही बस जीता-खाता।
केवल सींग और पूँछ नही पर मानव में भी पशुता है,
विस्फोटक का कर प्रयोग ये वायु में भी विष घोलता है।
लेकिन बड़ा ही ढोंगी मानव पर्यावरण दिवस मनाता है,
खुद ही पशु प्रेमी बनता, पशु- पक्षी भी पालता है।
गूँज उठा सारा जंगल कि पालो नहीं हमे पलने दो;
हम भी इसी धरा के वासी, सहज हमें भी रहने दो।
पालो नहीं, हमे पलने दो।
रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

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ReplyDeleteSunder ,adbhut hai rachana aapki......
ReplyDeleteआभार
Deleteबहुत ही सुंदर रचना
ReplyDeleteWah. Bahut khoob. Ek achha संदेश
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