Saturday, 25 September 2021

मै हूँ एक नदी की धारा


मै नदिया की वो धारा हूँ,
जो बहकर आगे जायेगी।
पथरीले राहो में चलकर 
अपनी मंजिल को पाएगी।
राह भले ही मुझको रोके 
मैंने कब रुकना सीखा है।
मैंने तो मुश्किल से लड़कर 
बस आगे बढ़ना सीखा है।
शीतलता मुझमे है समायी 
मैंने सबकी प्यास बुझायी।
भूतल की शोभा बनकर के 
सारे जग को मै हरषायी।
मन में मेरे भरी उमंगें,
नयनों में सपने पलते है।
देख के मेरी गति अनोखी,
ताल, नहर, निर्झर जलते है।
एक दिन ऐसा आएगा,
जब दुनिया को दिखलाऊॅगी।
छोड़ के अपने पीछे सबको,
सागर में मिल जाउंगी।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Friday, 24 September 2021

कृष्ण का बालरूप

मोहक रूप निहारु पल पल 
देखु तुम्हारी ओर
तुम बिन सुन्दर कुछ भी नहीं है 
क्या देखु कुछ और 
चन्दन तिलक मनमोहिनी सूरत
तोरे कंठ बैजन्ती पुष्प माल
बसों मेरे हृदय में नंदलाल
मोरपंख सर हाथ में बंशी 
नयन मीन जश  लागे 
होठ कमल सा सुन्दर शोभे 
बंशी धुन मन राजे 
नाम कन्हैया सबको भाये 
नील बदन मन मोहे 
नटखट कान्हा रास रचाये 
पूजे सब जग तोहे 


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Sunday, 19 September 2021

प्रभात

मोहक है प्रभात की बेला,
बीत गया तारो का मेला।
चंदा मामा छुप गए नभ में,
सूरज आये नील गगन में।
वन उपवन में फूल है महके,
पुलकित होकर पंछी चहके।
रवि की किरणे भूतल छूकर,
नमन कर रही धरती माँ को।
जग में उजियारा भर देती,
दूर भगाकर अंधियारे को।
शीतल हवा है मन को भाती,
जग में शीतलता भर देती।
शीतल तन है, शीतल मन है
शीतलता में जन-जीवन है
और तू सो रहा है ?
उठ ! जाग !
क्या लाया था साथ में अपने
जिसको डर है की अब खोना है
जग में तेरा क्या लागे है ?
जिसका रोना, रोना है
कर्म ही तेरे बस में है
बाकी तो सब कुछ होना है
जैसी फसल है मन को भाती
बीज वैसा ही बोना है
जीवन क्या है ? रंगमंच।
अपना किरदार निभाना है
और हर लम्हे को जीना है
एक बार जब प्राण गए
तब गहरी नींद में सोना है
जाने फिर प्रभात कब होना है।


रचना - (संगीता पाण्डेय) ✍️

Saturday, 18 September 2021

विश्व भक्ति जागृत हो...


देश प्रेम और देशभक्ति से, 

क्या हासिल कर पाए हैं हम,

 मानवता की चिता जलाकर,

 हाथ सेंकते आए हैं हम 

जन्म मिला इस वसुंधरा पर, 

छत है ये आकाश सबका, 

एक है सूरज चांद एक है, 

और ये सारा जहां सभी का 

सबको अपने स्वार्थ की ख़ातिर 

खंडित करते आए हैं हम,

 मानवता की चिता जलाकर,

 हाथ सेंकते आए हैं हम,

 क्या हो गर सरहद ना हो, 

सैनिक ना हो युद्ध भी ना हो, 

भाषा की तकरारे ना हो, 

मजहब की दिवारे ना हो 

याद करो की प्रेमशांति का, 

स्वप्न संजोते आए हैं हम, फिर भी....क्यों ?

 मानवता की चिता जलाकर, 

हाथ सेंकते आए हैं हम,



रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️
 

माँ

हमने सभी रिश्तो में मिलावट देखा,  हमने कच्चे रंग का सजावट देखा। लेकिन सालों साल से देखा है मैंने माँ को, ना चेहरे पर कभी उसके थकावट को देखा,...