जो बहकर आगे जायेगी।
पथरीले राहो में चलकर
अपनी मंजिल को पाएगी।
राह भले ही मुझको रोके
मैंने कब रुकना सीखा है।
मैंने तो मुश्किल से लड़कर
बस आगे बढ़ना सीखा है।
शीतलता मुझमे है समायी
मैंने सबकी प्यास बुझायी।
भूतल की शोभा बनकर के
सारे जग को मै हरषायी।
मन में मेरे भरी उमंगें,
नयनों में सपने पलते है।
देख के मेरी गति अनोखी,
ताल, नहर, निर्झर जलते है।
एक दिन ऐसा आएगा,
जब दुनिया को दिखलाऊॅगी।
छोड़ के अपने पीछे सबको,
सागर में मिल जाउंगी।
रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️