Sunday, 19 September 2021

प्रभात

मोहक है प्रभात की बेला,
बीत गया तारो का मेला।
चंदा मामा छुप गए नभ में,
सूरज आये नील गगन में।
वन उपवन में फूल है महके,
पुलकित होकर पंछी चहके।
रवि की किरणे भूतल छूकर,
नमन कर रही धरती माँ को।
जग में उजियारा भर देती,
दूर भगाकर अंधियारे को।
शीतल हवा है मन को भाती,
जग में शीतलता भर देती।
शीतल तन है, शीतल मन है
शीतलता में जन-जीवन है
और तू सो रहा है ?
उठ ! जाग !
क्या लाया था साथ में अपने
जिसको डर है की अब खोना है
जग में तेरा क्या लागे है ?
जिसका रोना, रोना है
कर्म ही तेरे बस में है
बाकी तो सब कुछ होना है
जैसी फसल है मन को भाती
बीज वैसा ही बोना है
जीवन क्या है ? रंगमंच।
अपना किरदार निभाना है
और हर लम्हे को जीना है
एक बार जब प्राण गए
तब गहरी नींद में सोना है
जाने फिर प्रभात कब होना है।


रचना - (संगीता पाण्डेय) ✍️

No comments:

Post a Comment

माँ

हमने सभी रिश्तो में मिलावट देखा,  हमने कच्चे रंग का सजावट देखा। लेकिन सालों साल से देखा है मैंने माँ को, ना चेहरे पर कभी उसके थकावट को देखा,...