मोहक है प्रभात की बेला,
बीत गया तारो का मेला।
चंदा मामा छुप गए नभ में,
सूरज आये नील गगन में।
वन उपवन में फूल है महके,
पुलकित होकर पंछी चहके।
रवि की किरणे भूतल छूकर,
नमन कर रही धरती माँ को।
जग में उजियारा भर देती,
दूर भगाकर अंधियारे को।
शीतल हवा है मन को भाती,
जग में शीतलता भर देती।
शीतल तन है, शीतल मन है
शीतलता में जन-जीवन है
और तू सो रहा है ?
उठ ! जाग !
क्या लाया था साथ में अपने
जिसको डर है की अब खोना है
जग में तेरा क्या लागे है ?
जिसका रोना, रोना है
कर्म ही तेरे बस में है
बाकी तो सब कुछ होना है
जैसी फसल है मन को भाती
बीज वैसा ही बोना है
जीवन क्या है ? रंगमंच।
अपना किरदार निभाना है
और हर लम्हे को जीना है
एक बार जब प्राण गए
तब गहरी नींद में सोना है
जाने फिर प्रभात कब होना है।
रचना - (संगीता पाण्डेय) ✍️
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