Thursday, 13 January 2022

उलझन

 

अक्सर ऐसा होता है

मन, मन ही मन में रोता  है।

 

क्यों जो दिखता वो ना होता ?

और जो होता कभी ना दिखता,

भ्रमजाल है बिखरा दुनिया में,

पर कौन इसे समझता है,

मन, मन-ही-मन  में रोता  है।


कुछ खोता है, कुछ पाता है,

सब पाकर भी पछताता है,

कभी बैठ ख़ुशी  से गाता है,

और मन का चमन सजाता है,  

पर मन-ही-मन  में रोता  है।

 

मन ही मन की उलझन है,

उलझन ही मन की फितरत है,

मन को सुलझाना चाहा पर ,

ये हर पल और उलझता है,

मन, मन ही मन  में रोता  है।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

 

 

 

 

1 comment:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना है।

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