Tuesday, 1 March 2022

भोले की महिमा


हाथ में जिसके डमरू बाजे,   
गले मे लिपटे नाग, 
लीला जिसकी अपरम्पार
वो हैं भोले नाथ

एक फूल, एक पत्र बेल का, 
एक लोटा जल की धार, 
हे भोलेनाथ ! हे महादेव ! 
कर दे भक्तों का कल्याण

भोले की महिमा है अपरंपार,
सभी भक्तों का करते कल्याण, 
आओ शीश नवाये भोले के चरणों में, 
मिल कर हम बांटे भोले का प्यार अपनों मे 

चरण में रखना, शरण में रखना, 
हरदम तेरी लगन में रखना, 
सुख का उजियारा हों या दुःख का अँधेरा, 
जो भी हो भोले, मगन में ही रखना

माला ये साँसों की, सिमरन के मोती, 
मेरा मन ना भटके, शरण में रखना, 
पलकें गिराऊ जो भोले, बस तेरे ही हो दर्शन, 
हर पल मुझे बस इसी तड़पन में रखना।


रचना - (अभय तिवारी) ✍️


Friday, 25 February 2022

जागरूक मतदाता

            

    चलो बहन सब काज छोड़ दो,

    काम-धाम, आराम छोड़ दो।

    समय निकालो, बूथ पे जाओ,

    वोट करो और फर्ज निभाओ।

 

      💁🏻‍  हा.. हा.. हा..

       मै ना छोडूँ काज जरूरी,

       काम-धाम, आराम जरूरी।

       नही कभी मैं बूथ पे जाऊँ,

       नाही किसी को चुनकर लाऊँ।

 

       मै अपनी दुनिया में रहती,

       मौज उड़ाती, ऐश हूँ करती।

       देश- समाज से मुझे क्या लेना,

       मुझे किसी को वोट न देना।

 

       कोई जीते, कोई हारे,

       भला करे या सबको मारे।

       मैं अपने घर में रहती हूँ,

       न्यूज़ लगा देखा करती हूँ।

        समय- समय पर,

        जोश में भरकर,

        खरी-खोटी कहा करती हूँ।

 

        सरकारें कुछ काम न करतीं,

        लूट- पाट कर जेबें भरतीं।

        हम तो कोसेंगे जी भरकर,

        आए चाहें कोई जीतकर।

 

       🧏‍ सुनो बहन!

        सुनो बहन यह बात गलत है,

        समझ तुम्हारी, सोच गलत है।

        घर बैठे तुम कोसा करती,

        अपना रोना, रोया करती।

        नहीं किया मतदान अगर तो

       सही-गलत की बात क्या करती।

 

       लोकतंत्र की गरिमा को,

       तुम कैसे समझ न पाती हो।

       घर बैठे बातें करती हो,

       व्यर्थ में वोट गँवाती हो।

       देश- समाज से पृथक नहीं,

       तुम खुद भी इसका हिस्सा हो।

       सबकी नैया डुबा रही हो,

       बरबादी का किस्सा हो।

 

       मिला हमें अधिकार चलो

       हम अपना नेता चुनते हैं।

       नव- भारत निर्माण करें

       और स्वप्न मनोहर बुनते हैं।

 

       जाँच - परखकर, 

       सोच - समझकर,

       काबिल नेता लाएँगे,

       जो होगा हितकारी मानव,

       उसी को डोर थमाएँगे।

 

      💁🏻‍️समझ गई मैं बात तुम्हारी,

       मेरी गई थी बुद्धी मारी।

       अब ना कुछ नुकसान करुँगी,

       अभी चलो मतदान करुँगी।


        रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Wednesday, 9 February 2022

विदाई

 

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ  छोड़कर,

मोह-माया, प्यार-ममता,

सारे बंधन तोड़कर।

 

ओस की बूंदो सी निर्मल,

भावनाये प्रियजनों की,

माँ की ममता स्नेह सबका,

हठखेलिया भाई-बहन की,

सब चलेंगे संग तेरे,

तेरा दामन थामकर,

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ छोड़कर।

 

माँग ले रब से दुवाएँ,

पीहर तेरा अमर हो,

तू रहे खुशहाल हरदम,

ससुराल तेरा स्वर्ग हो,

मन तेरा मंदिर बने,

मंदिर में तेरे राम हो,

हर जनम में सात जन्मो का,

उन्ही का साथ हो।

 

स्वप्न भर ले नयन में तू,

सारे गम को भूलकर,

जा रे बहना पी के घर,

बचपन की गलियाँ छोड़कर।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

Thursday, 13 January 2022

उलझन

 

अक्सर ऐसा होता है

मन, मन ही मन में रोता  है।

 

क्यों जो दिखता वो ना होता ?

और जो होता कभी ना दिखता,

भ्रमजाल है बिखरा दुनिया में,

पर कौन इसे समझता है,

मन, मन-ही-मन  में रोता  है।


कुछ खोता है, कुछ पाता है,

सब पाकर भी पछताता है,

कभी बैठ ख़ुशी  से गाता है,

और मन का चमन सजाता है,  

पर मन-ही-मन  में रोता  है।

 

मन ही मन की उलझन है,

उलझन ही मन की फितरत है,

मन को सुलझाना चाहा पर ,

ये हर पल और उलझता है,

मन, मन ही मन  में रोता  है।


रचना - (संगीता पाण्डेय ) ✍️

 

 

 

 

Sunday, 2 January 2022

जीवन की रीत


सबको हँसाते रहना तुम,       
लेकिन
कभी किसी पर हँसना मत।

सबके दुख बाॅटते रहना तुम,
लेकिन
किसी को दुख मत देना तुम।

सबकी राहों में दीप जलाते रहना तुम,
लेकिन
किसी के दिल को मत जलाना तुम।

सबके आगे आत्मसम्मान से शीश झुकाना तुम ,
लेकिन
कभी किसी को नीचा मत दिखाना तुम।

सबका करते रहना सम्मान तुम,
लेकिन
कभी किसी से ईर्ष्या, द्वेष न रखना तुम।

सदा अपने आचार-विचार को ठीक रखना तुम,
लेकिन
कभी भी बुरे व्यसनों में ना फँसना तुम।

यही है जीवन की रीत,
इसे सदा दिल मे बसाये रखना तुम।


रचना - (अभय तिवारी) ✍️

Friday, 24 December 2021

मै एक अकेला


एक अकेला बूँद हूँ,
मिल जाऊँ तो दरिया हूँ।
एक अकेला वृक्ष हूँ,
मिल जाऊँ तो उपवन हूँ।
एक अकेला पत्थर हूँ,
मिल जाऊँ तो पर्वत हूँ।
एक अकेला तिनका हूँ,
मिल जाऊँ तो घोसला हूँ।
एक अकेला धागा हूँ,
मिल जाऊँ तो चादर हूँ।
एक अकेला कागज हूँ,
मिल जाऊँ तो किताब हूँ।
एक अकेला अलफ़ाज़ हूँ,
मिल जाऊँ तो सुंदर रचना हूँ।
एक अकेला मैं ईंट पत्थर हूँ,
मिल जाऊँ तो इमारत हूँ।
एक अकेला मैं दुआ हूँ,
मिल जाऊँ तो इबादत हूँ।


रचना - (अभय तिवारी) ✍️

Monday, 6 December 2021

चरण वंदन 🙏

जो पिता का चरण वंदन करता है,
वो कभी गरीब नहीं होता।

जो मां का चरण वंदन करता है,
वो कभी बदनसीब नही होता।

जो भाई का चरण वंदन करता है,
वो कभी गमगीन नही होता।

जो बहन का चरण वंदन करता है,
वो कभी चरित्रहीन नहीं होता।

जो गुरू का चरण वंदन करता है,
उस जैसा कोई खुशनसीब नहीं होता।

जो अपने से बड़ों का चरण वंदन करता है,
उसके पुण्य में बढ़ोतरी होती है।

जो भगवान का चरण वंदन करता है,
भगवान उसका साथ कभी नहीं छोड़ता।


रचना - (अभय तिवारी) ✍️ 

माँ

हमने सभी रिश्तो में मिलावट देखा,  हमने कच्चे रंग का सजावट देखा। लेकिन सालों साल से देखा है मैंने माँ को, ना चेहरे पर कभी उसके थकावट को देखा,...