किसी शहर में एक धनवान व्यापारी रहता था, उसके पास कोई धन और संपत्ति की कमी ना थी, बहुत बड़ी कोठी थी, नौकर भी थे, किसी तरह की कोई कमी ना थी, लेकिन फिर भी वह हर समय परेशान रहता था। उसकी यह परेशानी दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी। ना दिन मे उसे चैन मिलता ना रात मे उसे सुकून मिलता। उसकी तबियत पहले से ज्यादा बिगड़नी शुरू हो गयी, क्या करे उसे कुछ सूझ भी नहीं रहा था । एक दिन उसके किसी रिश्तेदार उसके यहाँ मिलने आया और उससे उसकी परेशानी का कारण जानना चाहा, तब उस व्यापारी ने उसे पूरी बात बता दी।
उसके शहर से कुछ दूर एक घने जंगल में एक स्वामी जी अपने शिष्यों के साथ डेरा डाले हुए थे। ये बात उनके रिश्तेदार द्वारा उस व्यापारी को पता चली। उस रिश्तेदार ने उस व्यापारी से आग्रह किया कि वो उन स्वामी जी से मिलकर अपनी समस्या का समाधान जाने। वो व्यापारी बिना विलंब किये अगले दिन स्वामी जी से मिलने पहुँचा । स्वामी जी से मिलकर अपनी सारी समस्याएं बतायी और बोला प्रभु , मै अपने जिदंगी से परेशान हू मुझे दिन रात नींद नही आती, मै अवसाद ग्रस्त हो चुका हूँ और तनाव से घिरा महसूस कर रहा हूँ मुझे इस समस्या से निजात दिलाये।
स्वामी जी ने कहा - घबराना नही है घबराने से बात बिगड़ती है। तुम्हारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी। भगवान के चरणों में दीप जलाना शुरू कर दो। स्वामी जी ने उसे अंतर्मन से पुजा पाठ करने की सलाह दी, कुछ दिन पुजा पाठ करने के बाद उसका मन इससे भी हटने लगा । वह जब भी पूजा करने बैठता उसका मन नही रमता और इधर उधर की बातें सोचने लगता। लगातार दिन बीतता चला गया। वो व्यापारी उस स्वामी जी से मिलने उनके पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई, लेकिन स्वामी जी ने उसकी बाते सुनकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और शांत रहे।
एक दिन की बात है वो व्यापारी स्वामी जी के साथ बाते करते हुए घूम रहा था तभी अचानक उसके पैरो में एक बडे से पत्थर से ठोकर लगी और वहीं बैठ गया तथा पैरो को देखा और पकड़कर चिल्लाने लगा - "स्वामीजी, मुझे कुछ उपाय बताये ? मुझे बहुत पीड़ा हो रही है।" तब स्वामी जी बोले - " रो क्यों रहे हो? छोटा सा पत्थर ही तो लगा है । व्यापारी ने उस चोट को सहलाया और मरहम लगाया तब उसे उस पीड़ा से मुक्ति मिला।
स्वामी जी कुछ देर सोचने के बाद बोले ने - हे मनुष्य तुम्हे जरा सी चोट क्या लग गयी तुम इतना गहरी वेदना में डूब गये, तुम्हें इतनी पीड़ा होने लगी की तुम बर्दाश्त नहीं कर पाये। लेकिन जरा सोचो कि तुम अपने अंदर कितने पत्थरों के चोट के निशान लेकर घूम रहे हो। लोभ के, मोह के, क्रोध के, ईर्ष्या के, द्वेष के, जलन के, अहंकार के। जब तक तुम उन पर मरहम लगाकर नही ठीक करोगे तब तक तुम शांति की उम्मीद कैसे कर सकते हो ?"
स्वामी जी के इस दिव्य कथन को सुनने के बाद उसके अंदर ज्ञान की लौ प्रज्जवलित होने लगी, उसकी अंतरात्मा तृप्त हो उठी, उसके अदर ज्ञान का प्रकाश विधमान हो गया।अज्ञानता का अंधकार हमेशा के लिए दूर हो गया। उसे शांति का पथ प्रदर्शित होने लगा।
रचना - (अभय तिवारी) ✍️